पंजाब में जब वर्तमान सरकार सत्ता में आई थी, तो उसने पारदर्शिता और ईमानदारी के बड़े-बड़े दावे किए थे। खासकर ग्रामीण विकास और पंचायत विभाग को भ्रष्टाचारमुक्त बनाने का वादा खुद मंत्री तरणप्रीत सिंह संध ने किया था। लेकिन अब वही विभाग 120 करोड़ 87 लाख रुपये के सबसे बड़े घोटाले की चपेट में है, और सत्ताधारी मौन हैं।
संयुक्त निदेशक जगविंदर सिंह संधू की जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि अवार्ड मनी जो सलेंमपुर, सेखेवाल, करियाणा खुर्द, बोकत गुजरां जैसी पंचायतों को मिली थी, उसका बड़ा हिस्सा गबन कर लिया गया और संबंधित रिकॉर्ड जानबूझ कर नष्ट कर दिए गए।
जांच में यह भी सामने आया कि न तो यह रिकॉर्ड नई ग्राम पंचायतों को चार्ज में सौंपे गए और न ही विभाग में जमा करवाए गए। यानी पूरी प्रणाली को ही ठेंगा दिखाया गया। इतना बड़ा घोटाला, और दस्तावेज़ नदारद!
सुखपाल सिंह गिल ने इस गबन की जानकारी बार-बार व्हाट्सएप, ईमेल और डाक द्वारा मंत्री तरणप्रीत सिंह संध और विभाग के उच्च अधिकारियों को दी। बावजूद इसके कोई कार्रवाई नहीं की गई।
जांच रिपोर्ट के पेज नंबर 11 में स्पष्ट लिखा गया है कि 26 करोड़ 56 लाख की रिकवरी की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया और दोषियों से कोई जवाब-तलबी नहीं हुई। क्या यह लापरवाही नहीं, बल्कि मिलीभगत नहीं है?
जांच अधिकारी रिटायर्ड आईएएस रमेश चंद्र नायर को विभाग ने अधिकृत किया, लेकिन उन्होंने 15 महीनों तक न तो जांच पूरी की और न ही कोई रिपोर्ट सौंपी। इसके उलट, जांच को जानबूझकर लंबित रखा गया।
आश्चर्य की बात यह है कि विभाग के वित्त आयुक्त दिलराज सिंह ने जांच को रोकने के लिए पत्र लिखा, जो दर्शाता है कि उच्च अधिकारियों ने भी इस घोटाले को दबाने की कोशिश की।
यह सारा घोटाला सामने आने के बावजूद विभागीय मंत्री और उच्च अधिकारी चुप हैं। न कोई एफआईआर, न कोई सस्पेंशन, न ही रिकॉर्ड की बरामदगी—यह सब सवाल उठाता है कि सरकार किसे बचा रही है?
यदि यह मामला विजिलेंस या ईडी को सौंपा जाए और रिकॉर्ड रिकवर किए जाएं, तो घोटाले की राशि 200 करोड़ तक पहुंच सकती है। यह कोई मामूली वित्तीय अपराध नहीं, बल्कि योजनाबद्ध सरकारी लूट है।
अब समय है कि मुख्यमंत्री पंजाब स्वयं हस्तक्षेप करें और जांच को स्वतंत्र एजेंसियों को सौंपें। जब तक दोषियों से रिकॉर्ड और पैसे वापस नहीं लिए जाते, पंजाब में पंचायत तंत्र में पारदर्शिता की उम्मीद बेमानी है।
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